मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

बहुत कम लोगों को हे गौस्वामी तुलसीदास कि हनुमान चालीसा के बारे में ये जानकारी


ऐसा माना जाता है कि कलयुग में हनुमान जी सबसे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले भगवान हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने  हनुमान जी की स्तुति में कई रचनाएँ रची जिनमें हनुमान बाहुक, हनुमानाष्टक और हनुमान चालीसा प्रमुख हैं। हनुमान चालीसा की रचना के पीछे एक बहुत जी रोचक कहानी है जिसकी जानकारी शायद ही किसी को हो। आइये जानते हैं हनुमान चालीसा की रचना की कहानी :- भगवान को अगर किसी युग में आसानी से प्राप्त किया जा सकता है तो वह युग है कलियुग। इस कथन को सत्य करता एक दोहा रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है :-कलियुग केवल नाम अधारा ,सुमिर सुमिर  नर उतरहि  पारा।
जिसका अर्थ है की कलयुग में मोक्ष प्राप्त करने का एक ही लक्ष्य है वो है भगवान का नाम लेना। तुलसीदास जी ने अपने पूरे जीवन में कोई भी ऐसी बात नहीं लिखी जो गलत हो। उन्होंने अध्यात्म जगत को बहुत सुन्दर रचनाएँ दी हैं।
•गोश्वामी तुलसीदास और अकबर-
ये बात उस समय की है जब भारत पर मुग़ल सम्राट अकबर का राज्य था। सुबह का समय था एक महिला ने पूजा से लौटते हुए तुलसीदास जी के पैर छुए। तुलसीदास जी ने नियमानुसार उसे सौभाग्यशाली होने का आशीर्वाद दिया। आशीर्वाद मिलते ही वो महिला फूट-फूट कर रोनेलगी और रोते हुए उसने बताया कि अभी-अभी उसके पति की मृत्यु हो गई है।इस बात का पता चलने पर भी तुलसीदास जी जरा भी विचलित न हुए और वे अपने आशीर्वाद को लेकर पूरी तरहसे आश्वस्त थे। क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान भली भाँति था कि भगवान राम बिगड़ी बात संभाल लेंगे और उनका आशीर्वाद खाली नहीं जाएगा। उन्होंने उस औरत सहित सभी को राम नाम का जाप करने को कहा। वहां उपस्थित सभी लोगों ने ऐसा ही किया और वह मरा हुआ व्यक्ति राम नाम के जाप आरंभ होते ही जीवित हो उठा।यह बात पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गयी। जब यह बात बादशाह अकबर के कानों तक पहुंची तो उसने अपने महल में तुलसीदास को बुलाया और भरी सभा में उनकी परीक्षा लेने के लिए कहा कि कोई चमत्कार दिखाएँ। ये सब सुन कर तुलसीदास जी ने अकबर से बिना डरे उसे बताया की वो कोई चमत्कारी बाबा नहीं हैं, सिर्फ श्री राम जी के भक्त हैं।अकबर इतना सुनते ही क्रोध में आ गया और उसने उसी समय सिपाहियों से कह कर तुलसीदास जी को कारागार में डलवा दिया। तुलसीदास जी ने तनिक भी प्रतिक्रिया नहीं दी और राम का नाम जपते हुए कारागार में चले गए। उन्होंने कारागार में भी अपनीआस्था बनाए रखी और वहां रह कर ही हनुमान चालीसा की रचना की और लगातार 40 दिन तक उसका निरंतर पाठ किया, चालीसवें दिन एक चमत्कार हुआ। हजारों बंदरों ने एक साथ अकबर के राज्य पर हमला बोल दिया। अचानक हुए इस हमले से सब अचंभित हो गए। अकबर एक सूझवान बादशाह था इसलिए इसका कारण समझते देर न लगी।  उसे भक्ति की महिमा समझ में आ गई। उसने उसी क्षण तुलसीदास जी से क्षमा मांग कर कारागार से मुक्त किया और आदर सहित उन्हें विदा किया। इतना ही नहीं अकबर ने उस दिन के बाद तुलसीदास जी से जीवन भर मित्रता निभाई।इस तरह तुलसीदास जी ने एक व्यक्ति को कठिनाई की घड़ी से निकलने के लिए हनुमान चालीसा के रूप में एक ऐसा रास्ता दिया है। जिस पर चल कर हम किसी भी मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं।इस तरह हमें भी भगवान में अपनी आस्था को बरक़रार रखना चाहिए। ये दुनिया एक उम्मीद पर टिकी है। अगर विश्वास ही न हो तो हम दुनिया का कोई भी काम नहीं कर सकते।
🙏💐 जय श्री राम जय हनुमान  🙏💐

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

राष्ट्रीय सुरक्षा और ईसाईयत कि रणनीति


युद्ध कभी अकस्मात नहीं होते। कई छोटी-छोटी झड़प लड़ाईयां, कूटनीतिक असफलताएँ धीरे-धीरे वृहद् एवं विनाशकारी युद्ध का स्वरूप धर लेती हैं। इतिहासकारों ने जब प्रथम विश्व युद्ध के कारणों तथा कारकों का विश्लेषण करना आरंभ किया तो कई घटनाएं सामने आयीं। कुछ इतिहासकारों ने उन घटनाओं में से 1912-13 के दौरान हुए बाल्कन युद्धों को प्रमुख कारण माना। दरसअल बुल्गारिया स्थित 'बाल्कन' पर्वतों के आसपास के देशों ने स्वयं को 'बाल्कन लीग' घोषित कर दिया था और तुर्की पर आक्रमण कर दिया था जिसके फलस्वरूप प्रथम बाल्कन युद्ध हुआ। 1913 में हुए द्वितीय बाल्कन युद्ध के उपरांत 1914 में आर्कड्यूक फ्रांज़ फर्डीनांड की हत्या हुई और प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हो गया। भयंकर विनाश और त्रासदी के बाद युद्ध का सारा दोष जर्मनी के मत्थे मढ़ दिया गया और द्वितीय विश्व युद्ध की पटकथा भी लिख दी गयी। द्वितीय विश्व युद्ध तक किसी भी देश पर सबसे बड़ा खतरा बाह्य आक्रमण को ही माना जाता था इसलिए हर देश अपनी सशस्त्र सेनाओं (जल-थल-नभ) को शक्तिशाली बनाने पर ज़ोर देता था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व में दो महाशक्तियों का उदय हुआ- संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ (रूस)। शक्ति सन्तुलन की इस जंग में रूसियों ने कम्युनिस्ट विचारधारा से लैस आतंकवादी गुप्त रूप से अमरीका में भेजने शुरू किये। तब अमरीका की एजेंसियों ने बोल्शेविकों को राष्ट्रीय सांस्कृतिक परिवेश के विरुद्ध कार्य करने वाला माना और उनका निर्ममता से दमन किया। इस तरह एक नया विचार उभर कर आया जिसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा' कहा जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ है किसी भी राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक, खाद्य, सांस्कृतिक एवं सीमाओं की सामूहिक सुरक्षा। राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा प्रगति में योगदान देने वाले हर कारक की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा कहलाती है चाहे वह शिक्षा हो या राजनीतिक व्यवस्था। इनमें से किसी भी कारक पर खतरा हो तो उसे राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा माना जायेगा।

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप कई छोटे-छोटे राष्ट्रों में विभाजित हो गया था। चूंकि ये सब बाल्कन पर्वतीय देशों के बीच झगड़े से प्रारंभ हुआ था अतः किसी भौगोलिक क्षेत्र का कई राष्ट्रीय अस्मिताओं में बंट जाना 'Balkanization' कहलाता है। जैसा कि आज हम पाकिस्तान के सन्दर्भ में देखते हैं कि बलोचिस्तान सिंध सभी इस्लामाबाद-रावलपिंडी के नियंत्रण से मुक्त होना चाहते हैं। यूरोप और अमरीका के चिंतन में एक विशेषता है कि वे इतिहास से सीखना जानते हैं। अपनी सत्ता का प्रभाव दूसरे देशों पर कायम रखने के लिए इन्होंने कई रणनीतियाँ अपनाईं जो प्रत्यक्ष युद्ध से भिन्न हैं। जैसा कि जनरल क्लॉज़्विट्ज़ ने 'On War' में लिखा है कि "War is the continuation of politics by other means." अर्थात् युद्ध भिन्न माध्यमों से राजनीति का विस्तार है। वैश्विक राजनीति में दबदबा रखने के लिए यूरोप-अमरीका युद्ध के कई परोक्ष तरीके अपनाते हैं। कभी जलवायु परिवर्तन का मुद्दा उठा कर तो कभी आर्थिक प्रतिबंध लगा कर। इन्हीं तरीकों में से एक है ईसाईयत का प्रचार व प्रसार जो भारत में ब्रिटेन से आये मिशनरी कई वर्षों से करते रहे हैं। ब्रिटिश शासन के आरंभ में अधिकारी क्रिकेट की टीमों का नामकरण 'हिन्दू टीम', 'पारसी टीम' इस तरह किया करते थे और हिन्दू मुसलमान इन दोनों को भिन्न समुदाय नहीं बल्कि 'Nationalities' अर्थात् दो अलग राष्ट्रीय अस्मिताएं कहा करते थे। भारत खण्ड के Balkanization में अंग्रेजों ने महती भूमिका निभाई और पाकिस्तान बनाने में सफलता पाई।

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जब कम्युनिस्ट रूस का खतरा नहीं रहा तब अमरीका के स्टेट डिपार्टमेंट यानि विदेश मंत्रालय ने एक शोध पत्र प्रकाशित किया। उसमें एक विचित्र प्रकार की चिंता प्रकट की गयी थी। उस दस्तावेज में लिखा गया था कि दक्षिण एशिया में स्थित भारतीय उपमहाद्वीप का समाज अपने मौलिक स्वरूप में सांस्कृतिक रूप से एक है। हिन्दू दर्शन से निकले विभिन्न मत सम्प्रदाय अफगानिस्तान में बामियान की बौद्ध मूर्तियों से लेकर कम्बोडिया में रामायण के मंचन तक फैले हुए हैं। यदि भविष्य में कभी ये सभी सांस्कृतिक समुदाय एक हो गए तो अत्यधिक शक्तिशाली हो जाएंगे जिससे अमरीका के सामरिक तथा भूराजनैतिक हितों पर आँच आना लाजमी हो जायेगा। मूल रूप से यह विचार रूसी चिंतक एंटोनियो ग्रामस्की का है जिसे Cultural Hegemony कहा जाता है जिसका अर्थ है किसी विशेष सांस्कृतिक समुदाय का दूसरे समुदाय के लोगों पर एकाधिकार स्थापित हो जाना। ऐसा दक्षिण एशिया में न हो इसीलिए यूरोप और अमरीका अपने ईसाई मिशनरियों को भारत में भेजकर 'faultlines' तलाशते हैं। समाज में उन्हें जहाँ भी आर्थिक असमानता की थोड़ी बहुत दरार भी दिखाई देती है वहाँ प्रहार करने से ये नहीं चूकते। हमारे शूद्र (कार्यकुशीलव) भाई बहनों को भड़का कर कथित ब्राह्मणवाद का डर दिखा कर उनका मतांतरण करते हैं। इस प्रकार एक हिन्दू शूद्र के गले में क्रॉस लटकाकर भारत की सामाजिक सांस्कृतिक एकता को क्षति पहुँचाकर ये भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को भेदने का कुत्सित प्रयास करते हैं। भारत का Balkanization इनका अंतिम मिशन है। यही काम एक समय में कम्युनिस्ट प्रचारक अमरीका में किया करते थे। अंतर यही है कि उनका तरीका थोड़ा हिंसक हुआ करता था तथा मत नहीं अपितु एक खास विचारधारा से प्रेरित था इसलिए बोल्शेविकों को पकड़ना आसान था। आज स्थिति यह है कि 'एवांजलिस्ट' मत प्रचारक अमरीकी प्रशासन में इतनी पैठ रखते हैं कि उन्होंने 1998 में The International Religious Freedom Act पास करवाया जिसके अनुसार यदि अमरीका को लगता है कि कोई देश अपने यहाँ किसी एक पंथिक समुदाय को प्राथमिकता दे रहा है या प्रोत्साहित कर रहा है तो उस पर पंथनिरपेक्षता को खतरा बताते हुए आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे।

भारतीय प्रबुद्ध समाज को ईसाईयत के खतरों के बारे में कुछ बातें स्पष्ट रूप से समझनी चाहिये। जो भी अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला सेंट मैरी, जॉन अथवा जोसेफ नामक कॉन्वेंट स्कूलों में करवाते हैं वे इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ हैं कि अनजाने में वे अपनी गाढ़ी कमाई ईसाई मिशनरियों को दे रहे हैं। वे इस पर विचार करें कि कोई स्कूल अपना नाम महर्षि भारद्वाज, चरक या भास्कराचार्य के नाम पर क्यों नहीं रखता जबकि ये विद्वान तो वैज्ञानिक हुआ करते थे। ईसाई मत में तो चमत्कार देख कर सन्त की उपाधि दी जाती है। कुछ ICSE बोर्ड के स्कूल संस्कृत को अंग्रेजी में पढ़ाते हैं ताकि बच्चों में संस्कृत साहित्य के प्रति रुचि उत्पन्न ही न हो। भारत में अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता को जन्म देने वाले सईद नक़वी साहब आज भले ही यह कहते हों कि भारत का मुसलमान खतरे में है लेकिन एक इंटरव्यू में उन्होंने यह स्वीकार किया है कि भारत की एकता को अक्षुण्ण रखने में साड़ी के साथ संस्कृत का भी महत्व है। इस पर विचार करें क्योंकि संस्कृत वह भाषा है जो पूजा पाठ के साथ उत्तर भारत से दक्षिण तक चली जाती है। राजीव मल्होत्रा ने Battle for Sanskrit में लिखा है कि बाबा साहेब अम्बेडकर ने संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा बनाने पर ज़ोर दिया था। वामपंथी इतिहासकारों पर तो हंसी आती है जब वे लिखते हैं कि भारत में शूद्रों पर ब्राह्मणों ने बड़ा अत्याचार किया। परन्तु वे यह तथ्य गोल कर जाते हैं कि हजार साल राज तो मुसलमानों ने किया। और मुसलमान शासकों ने हिन्दू कट्टरपंथियों को मनमानी करने तो नहीं ही दिया होगा। तब ब्राह्मण अत्याचारी कैसे हो गया?

अमरीका के विश्वविद्यालयों में बैठे कथित 'इंडोलॉजिस्ट' प्रोफेसर लिखते हैं कि चाणक्य के समय भारत में "Brahmanism" नामक रिलिजन था। वर्तनी पर ध्यान दीजियेगा Brahminism और Brahmanism में केवल 'i' और 'a' का फर्क है। Brahmanism को ये सब पूर्व वैदिक काल का रिलिजन कहते हैं उसको 'ब्रह्म' से जोड़ते हैं और लिखते 'ब्रह्मन्' हैं। बाद में Brahminism को ये ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण जाति से जोड़ते हैं। वस्तुतः ये फर्ज़ी इतिहासकार और इंडोलॉजिस्ट ब्रह्म, ब्रह्मा, ब्रह्मन्, ब्राह्मण किसी भी शब्द का सही अर्थ नहीं जानते वरना i और a के अंतर से जाति को रिलिजन नहीं बनाते। भारत विखण्डन शक्तियों का ये सब प्रोपेगैंडा हमारी सांस्कृतिक एकता को चुनौती देता है। वेंडी डोनिगर और शेल्डन पॉलक जैसे प्रोफेसर इस षड्यंत्र में अहर्निश लगे हैं कि किसी भी तरह भारतीयों का संस्कृत से मोहभंग किया जाये। कई साल पहले एक ईसाई मत प्रचारक तरुण विजय से एनडीटीवी पर इस पर बहस कर रहा था कि गीता में कहा गया है कि सभी धर्मों को छोड़ कर मेरे पास आओ। इसका अर्थ उसने यह निकाला कि हिंदुओं के भगवान यह कहते हैं कि अपना मत परिवर्तन करा लो। कुछ सप्ताह पहले हमारे एक मित्र अमरीका से आये थे उन्होंने एक किस्सा सुनाया कि वहाँ उन्हें एक ट्रक ड्राईवर ने गीता भेंट की और कहा कि यदि आप हिन्दू न होते तो शायद इसे लेने से मना कर देते। अमेरिका के उस ट्रक ड्राईवर ने अपना मतांतरण नहीं करवाया था बल्कि स्वेच्छा से गीता की ओर आकृष्ट हुआ था। हाल ही में हेनरी किसिंजर ने अपनी किताब World Order में गीता से प्रभावित होकर नैतिकता और शक्ति के बीच सम्बंध को दर्शाने के लिए उद्धृत किया है।

आज क्रिसमस का त्योहार है। लेकिन दुःख इस बात का है कि हम हिन्दू ईसाई मिशनरियों की चालों को न समझते हुए स्कूल कॉलेज में क्रिसमस कैरोल गाते गाते कई शहरों के गिरजाघरों के आसपास चाट पकौड़ी खाने पहुँच जाते हैं। हमारे इसी उत्सव मनाने के स्वभाव का फायदा ईसाई मिशनरी उठाते हैं। गाँव के भोले भाले लोगों से जादू टोने के ज़रिये ईसाईयत का प्रचार करने को कहते हैं। आज भारत के दक्षिणी भूभाग के कई हिस्से और पूर्वोत्तर राज्य अपनी मौलिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से कट गए हैं। आप क्रिसमस मनाइये लेकिन साथ ही अपने शूद्र और मतांतरित भाई बहनों को genesis और ऋग्वेद की ऋचाओं में अंतर भी बताइये। हिंडोल सेनगुप्ता ने लिखा है कि जेनेसिस के अनुसार ईश्वर ने कहा और धरती आसमान सूरज चांद सब बन गया। यहाँ प्रश्न की गुंजाइश ही नहीं है। जबकि ऋग्वेद 10.129 में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति पर ही प्रश्न किया गया है। हिन्दू धर्म है रिलिजन नहीं। हिन्दू प्रश्न कर सकता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आप राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सजग हैं? क्या आप भारत का Balkanization होने देंगे?

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

वराह अवतार


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अयनांत काल है - 21 दिसम्बर से 14 जनवरी तक। वाराह प्रतिमायें इस समय से जुड़ी हैं। अवतार की प्रतिमाओं में वाराह के एक दाँत पर उद्धार  की गयी पृथ्वी दिखती है और उसके गले पर 27 नक्षत्रों के प्रतीक और पीठ पर आकाशीय पिंड प्रतीक देव उत्कीर्ण होते हैं। ये प्रतिमायें इस तरह बनायी गयीं कि शीत अयनांत के दिन वाराह पर विष्णु स्तम्भ की प्रात:छाया सीधे पड़े। विष्णु स्वरूप वाराह वास्तव में सूर्य ही हैं। धरती का जलमग्न होना वास्तव में दक्षिणायन सूर्य के कारण घटा हुआ प्रकाश ताप है। जल शीतल होता है। शीतलता का सम्बन्ध अवसान से है, सूर्य ऊष्ण होता है, ऊष्मा का सम्बन्ध जीवन से है। देह में जीवन हो तो ऊष्म रहती है। वाराह अवतार जीवन की स्थापना है। वाराह उत्सव वैसे ही होने चाहिये जैसे पश्चिम में अयनांत से जुड़ा क्रिसमस।  :) क्या मैं सही कह रहा हूँ?

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

टैगोर खानदान कि सच्चाई

जो लोग टैगोर के खानदान के तैमूर  तक पंहुचने की बात करते हैं उन्हें टैगोर खानदान के बारे में भी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए ।1860-70 में बंगाल के पुरुलिया में एक अत्यंत निर्धन  ब्राह्मण परिवार रहता था जिसमे चार भाई थे ।चारों गौर वर्ण के सुन्दर कुछ पढ़े लिखे भी । तब के बिहार बंगाल में भूमिहीन ब्राह्मणों की शादी मुश्किल थी । अंत में इनमे से दो भाइयों ने गाँव की ही एक हरिजन कन्या को बहला फुसला कर उसे अपनी रखैल बना लिया और गांव में विरोध के डर से उसे लेकर चटगांव भाग गए । वहां तब अंग्रेज बहुत बड़ा बंदरगाह बना रहे थे । एक अंग्रेज ने गोरे चिट्टे भाइयों को देखा तो उन्हें अपने काम की देखरेख में रख लिया । धीरे धीरे दोनों वही छोटी मोटी ठिकेदारी करते करते इतने अमीर हो गए कि तब एक अंग्रेज के साथ अपनी शिपिंग कंपनी खड़ी कर ली और कोलकाता में अपनी शानदार कोठी बना ली । इन्ही दोनों भाइयों की साझा संतान हुए द्वारकानाथ ठाकुर या टैगोर ।टैगोर नाम ठाकुर का अंग्रेजों द्वारा अपने तरीके से इन्हें ठाकुर को तोड़ मरोर कर पुकारे जाने के कारन पड़ा । इतने अमीर होने के बाबजूद कोलकाता का ब्राह्मण समाज इनके पुराने इतिहास के कारण इन्हें तुच्छ समझता था और आज भी बंगाल में "पिराली ब्राह्मण" एक गाली मानी जाती है जो इसी परिवार के कारन प्रचलित हुई । पिराली शब्द पुरुलिया से आया है । द्वारकानाथ ठाकुर बहुत खर्चीले रईस थे और तब उनका सालाना खर्च एक लाख सालाना था जब एक रूपए महीने में सामान्य आदमी परिवार चलाता था । इनके पुत्र देवेन्द्र नाथ अपने बाप की अय्याशी से नफरत करते थे और बाद में सन्यस्त हो गए थे । इन्ही देवेन्द्रनाथ के पुत्र कविवर रविंद्रनाथ टैगोर हुए जिनकी पोती शर्मीला ने नबाब पटौदी से शादी कर ली ।
यानी ये खानदान चाहे जो रहा हो इसकी आधारशिला ही अवैध रही है इसलिए आश्चर्य नहीं कि ये गिरते गिरते "तैमूर " तक आ गयी है ।

सभार:-

-Arun Mishra

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

अंग्रेजी शब्द कार Car एक वैदिक शब्द है.....

श्री चिंतामणि विनायक वैध्य ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक
(History of Hindu medaeval India)

में लिखा है कि हिंदुओं ने बड़े बड़े जलयानों का बनाना यूनानियों से सीखा जब वे कलिंग और आंध्र में फैल गए |

यह सच है की यूनानी समुद्री यात्रा करते थे पोत-निर्माण शिल्प के जानकार थे परंतु यह कदापी ग्रहणयोग्य नहीं लगता कि
युनानीओं ने हीं आर्यों को जलपोत बनाना सिखाया ......

इस बात को साबित करने के लिये कि हमारे पूर्वज आर्य भी प्राचीनकाल में जलयात्रा करते थे,

हमें एक अंग्रेजी शब्द का इतिहास जानना होगा.....

ये शब्द है.... #Car

कार् शब्द मूल संस्कृत शब्द #कारं से अंग्रेजी में प्रचलित हुआ था....

ओर संस्कृत में कारं का अर्थ जलयान है.....

ऋकवेद का यह श्लोक तथा इसके अर्थ शायद आपको यकीन दिला सकता है...

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यासनेहसं ।।
परिप्रासिण्यदत् कविः
सिन्दोरुर्मावधिश्रीतः
कारं विभ्रत् पुरुस्पृहम् ।।
ऋ। ८/१४/१

*****हे शिल्पी तुम् समन्दर के लहरों पर
(कारं) जलयान निर्माण करके
आनन्दपूर्वक यात्रा करो *****

"वेदों के यथार्थ स्वरूप"
पुस्तक के page..74 देखें..

वेद व पुराणों में ऐसे अनगिनत ऐतिहासिक तथ्य मिल जाते है जिसे अंग्रेजी ऐतिहासिकों को अनुकरण करनेवाले तथाकथित भारतीय ऐतिहासिक एक प्रमाण भी नहीं मानते है.....

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

लैंप पोस्ट के नीचे दीनबंधु निराला

~राजेश जोशी~

मैं आज तक किसी महापुरुष से नहीं मिला हूँ लेकिन कई महापुरुषों की कहानियाँ पढ़ी हैं कि कैसे अभावों में उनका जीवन बीता और कैसे लैंपपोस्ट के नीचे बैठकर रात रात को उन्होंने पढ़ाई पूरी की.

दीनबंधु निराला कोई महापुरुष नहीं है. अलबत्ता उसका नाम दो महापुरुषों के नाम से बना है - महात्मा गाँधी के सहयोगी दीनबंधु एण्ड्रूज़ और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला.

वो एक 18 वर्ष का किशोर है जिसे आप किसी शाम पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान के बीचोंबीच लगे ऊँचे लैपपोस्ट के नीचे गणित के सवालों से जूझते देख सकते हैं.

वहाँ सेना या सुरक्षा बलों में भर्ती होने की तैयारी कर रहे कुछ नौजवान कसरत करने आते हैं.

चने मुरमुरे बेचने वाला एक कमज़ोर वृद्ध ग्राहकों का इंतज़ार करते करते थक कर वहीं धरती पर बैठ गया था. कुछ बेरोज़गार नौजवान निरुद्देश्य टहल रहे थे.

मैदान के चारों ओर सड़कों से मोटर, कार, ट्रक और टैम्पो के हॉर्न की आवाज़ें आ रही थीं.

रह रह कर एक बारात में छोड़े गए पटाख़ों की आवाज़ें भी आसमान में गूँज जाती थीं. इतने शोर शराबे के बीच लैंपपोस्ट के नीचे बने चबूतरे पर दीनबंधु निराला अपनी किताबों पर झुका हुआ गणित के मुश्किल सवाल सुलझाने में लगा था.

मैं उसके बिलकुल पास जाकर बैठ गया और इंतज़ार करता रहा कि किसी तरह बात शुरू हो. लेकिन उसने नज़र उठाकर मेरी ओर नहीं देखा.

शोर के बीच भी वो एक स्वनिर्मित सन्नाटे में समाधिस्थ था ! मैंने देखा गणित के समीकरण उसकी कलम से निकल निकल कर कॉपी पर बिछते जा रहे थे, जिन्हें मैं नहीं समझ पाया.

समीकरण सिद्ध होने के बाद लिखा गया अँग्रेज़ी का सिर्फ़ एक शब्द - प्रूव्ड यानी सिद्ध हुआ - मुझे समझ में आया. आख़िर मैंने ही बातचीत की शुरुआत की.

"क्या बनना चाहते हो?" "मैं मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहता हूँ और अगर ख़ुदा भी आ जाए तो मुझे वो रोक नहीं सकता".

"कहाँ रहते हो? "यहाँ से तीन सौ किलोमीटर दूर सुपोल ज़िले के एक गाँव में." "पिछले साल कितने नंबर आए थे?" "पिछले साल पाँच सौ में से 385 नंबर आए थे.

आइएससी (यानी बारहवीं) का इम्तिहान इस साल देने की तैयारी कर रहा हूँ." उसक आवाज़ में न तो ग़ुरूर का पुट था और न ही किशोर सुलभ कच्चा हौसला.

उसके बयान में आश्वस्ति का भाव था और ठोस आत्मविश्वास था. वो सिर्फ़ परीक्षा की तैयारी के लिए पटना आया है और अपने कुछ दोस्तों के साथ रहता है.

बदले में वो उनके लिए खाना बना देता है और इस बात के लिए वो अपने दोस्तों का बार बार शुक्र अदा करता है. बातचीत में काफ़ी वक़्त गुज़र गया था. अँधेरा कुछ और गहरा हो गया था.

निराला ने अपने बस्ते में किताबें समेटीं और लैंपपोस्ट से दूर अँधेरे में आगे बढ़ गया. उसे अभी बहुत लंबा सफ़र तय करना था. मैं चाहता हूँ कि दीनबंधु निराला मैकेनिकल इंजीनियर न बने.

मैं जानता हूँ कि वो कोई और बड़ा सपना देखने और उसे हासिल करने की कुव्वत रखता है.