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सोमवार, 3 अप्रैल 2017

●●●●राजस्थानी घुडल पर्व कि सच्चाई●●●●


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हिन्दुत्व को बचाने के लिये आपके द्वारा इस सत्य से हिन्दुओं को अवगत कराना आवश्यक है नही तो कालांतर मे अर्थ का अनर्थ हो सकता है !

मारवाड़ में होली के बाद एक पर्व शुरू होता है ,जिसे घुड़ला पर्व कहते हैं ।जिसमें कुँवारी लडकियाँ अपने सर पर एक मटका उठाकर उसके अंदर दीपक जलाकर गांव और मौहल्ले में घूमती है और घुडला गीत गाती है --
" घुड़लो घूमे छे जी घूमे छे ,घुड़ले रै बांधियो सूत !
घुड़लो घूमे छे जी घूमे छे !!
सुहागण बाहरे आव  !
घुड़लो घूमे छे जी घूमे छे !!
अब यह घुड़ला क्या है ? घुड़ला घुमाने के पीछे क्या उद्देश्य था ?
कोई नहीं जानता है ,इस पर्व की मूल घटना विस्मृत होने से उद्देश्य से ठीक विपरीत भाव से अत्याचारी घुड़ला खान की पूजा शुरू हो गयी ।यह भी ऐसा ही घटिया ओर घातक षड्यंत्र है जैसा कि अकबर को महान बोल दिया गया !
दरअसल हुआ ये था की घुड़ला खान अकबर का मुग़ल सरदार था और अत्याचार और पैशाचिकता में भी अकबर जैसा ही गंदा पिशाच था !
ज़िला नागोर राजस्थान के पीपाड़ गांव के पास एक गांव है कोसाणा ! उस गांव की लगभग 200 कुंवारी कन्याएं गणगौर पर्व की पूजा कर रही थी, वे व्रत में थी गणगौर व्रत करने वाली कन्याओं और महिलाओं को  मारवाड़ी भाषा में तीजणियां कहते हैं !
गाँव के बाहर मौजूद तालाब पर गौरी पूजन करने हेतु  सभी तीजणियां एकत्र हुई थी ।उधर से ही घुडला खान अपनी फ़ौज के साथ निकल रहा था,उसकी गंदी नज़र उन  तीजणियों पर पड़ी तो उसकी वंशानुगत इस्लामी पैशाचिकता जाग उठी !
उसने बलात्कार के उद्देश्य से तीजणियों का अपहरण कर लिया , जिस किसी  ने विरोध किया वही  मौत के घाट उतार दिया गया !
इसकी घटना की सूचना घुड़सवारों ने जोधपुर के राव सातल सिंह राठौड़ जी को दी !
राव सातल सिंह जी और उनके घुड़सवारों ने घुड़ला खान का पीछा किया और कुछ समय मे ही घुडला खान को रोक लिया। घुडला खान का चेहरा पीला पड़ गया उसने
सातल सिंह जी की वीरता के बारे मे सुन रखा था ! उसने अपने आपको संयत करते हुये कहा, " राव तुम मुझे नही दिल्ली के बादशाह अकबर को रोक रहे हो इसका ख़ामियाज़ा तुम्हें और जोधपुर को भुगतना पड़ सकता है "
राव सातल सिंह बोले , पापी दुष्ट ये तो बाद की बात है पर अभी तो मैं तुझे तेरे इस गंदे काम का यहीं पर दण्ड  देता हूँ!
राजपुतों की तलवारों ने दुष्ट मुग़लों के ख़ून से प्यास बुझाना शुरू कर दिया था ,
संख्या मे अधिक मुग़ल सेना के पांव उखड़ गये , राव सातल सिंह और उन की वीर सेना ने भागती मुग़ल सेना का पीछा कर ख़ात्मा कर दिया गया ! दुष्ट घुड़ले खान का शरीर तीरों से छलनी हो चुका था  . राव सातल सिंह ने तलवार के भरपुर वार से घुडला खान का सिर धड़ से अलग कर उसे हिन्दू महिलाओं के अपमान का दण्ड दे दिया !
राव सातल सिंह ने सभी तीजणियों को मुक्त करवा उनकी सतीत्व की रक्षा करी !
इस युद्ध में वीर सातल सिंह जी अत्यधिक घाव लगने से वीरगति को प्राप्त हुये !
कोसाणा  गाँव के तालाब पर सातल सिंह जी का अंतिम संस्कार किया गया, वहाँ मौजूद सातल सिंह जी की समाधि उनकी वीरता और त्याग की गाथा सुना रही है !
गांव वालों ने  तीजणियों को दुष्ट घुडला खानका सिर सौंप दिया !
बच्चियों ने घुडला खान के सिर को घड़े मे रख कर उस घड़े मे जितने घाव घुडला खान के शरीर पर हुये उतने छेद किये और फिर पुरे गाँव मे घुमाया और हर घर मे रोशनी की गयी !
यह है घुड़ले की वास्तविक कहानी जिसके बारे में अधिकांश लोग अनजान हैं ।
लोग हिन्दु राव सातल सिंह जी को तो भूल गए और पापी दुष्ट घुड़ला खान को पूजने लग गये !
इतिहास की सचाई जानें , हर भारतीय को इस बारे में बतायें और वीर सातल सिंह राठौड़ की पूजा करें  !
वीर सातल सिंह जी को याद करो नहीं तो हिन्दुस्तान के ये तथाकथित गद्दार इतिहासकार उस घुड़ला खान को देवता बनाने का कुत्सित प्रयास करते रहेंगे जैसे हर सड़क किनारे दफन किए गए भिखारियों  को गाजी बाबा बना कर हिन्दुओं से सजदे करवाए जाते हैं .......

(((((भ्राता Mahendra Meghwanshi द्वारा प्रेषित टिप्पणी का संपादित भाग .
उन्हें यह जानकारी Girvar Rathore Udeka जी द्वारा प्राप्त हुई , कुछ जानकारी मेरे पास भी थी जिसे संयुक्त प्रयास से पूर्ण रूप प्राप्त हुआ है @दिनेश विस्सा अकिल))))

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

●●●●जब अंग्रेज पहली बार ओडिशा आए थे●●●●

अंग्रेजों ने सबसे पहले साल 1633 में ओडिशा के तटवर्त्ती क्षेत्रों में अपना वाणिज्य केन्द्र बनवाया । उन्हें मोगल सल्तनत से इसकी अनुमति पत्र तो मिला था मगर उन गोरों ने जहाँ उनको जगह दिया गया था वहीं वाणिज्य केंद्र न बनाकर एक स्थानीय व्यक्ति के जगह पर बना दिया.....
फिर क्या था ....
अगले साथ आठ वर्षों तक दोनों पक्षों के बीच  झगडे दिन व दिन बढते चलेगये और अन्ततः
1644 को स्थानीय लोगों ने अंग्रेज व्यापारीओं पर
ऐसे हमले किए कि वह लोग सब छोडछाडकर
पास के जंगल मे भाग गये.....

अंग्रेज उस हमले से इतने भयभीत हो गये थे कि जंगल में ही कुछ दिनों तक छिपे रहने को सही समझा....

उस जंगल में फलदार वृक्ष कम ही थे मगर
ताड के वृक्ष बहुतायत में मिलजाते थे....
वहाँ उन ताड के वृक्षों में से नशीली रस ताडी निकालने को हांडी लटकाया गया था.....
मारे भुख और प्यास के अंग्रेज वह ताडी़ पिइ कर
आखीर में बिमारी का शिकार होकर मरने लगे.....

पुरानी अंग्रेजी डक्यूमेंट के मुताबिक इस भयनाक अवस्था से बच निकलकर मुट्ठी भर अंग्रेज मद्राज पहँच पाए थे.. .....
मद्राज में भी जब अंग्रेज पैर जमाने में विफल हुए वो बंगाल कि ओर कुच कर गये....

यदि बंगाल में इन कुत्तों कि वाजेगाजे के साथ स्वागत न किया गया होता
वरन पत्थर मारकर भगाया गया होता तो शायद
वह फिर भारत न लौटते उसी जाहाज में  इंलण्ड चलदिए होते.....

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

राष्ट्रीय सुरक्षा और ईसाईयत कि रणनीति


युद्ध कभी अकस्मात नहीं होते। कई छोटी-छोटी झड़प लड़ाईयां, कूटनीतिक असफलताएँ धीरे-धीरे वृहद् एवं विनाशकारी युद्ध का स्वरूप धर लेती हैं। इतिहासकारों ने जब प्रथम विश्व युद्ध के कारणों तथा कारकों का विश्लेषण करना आरंभ किया तो कई घटनाएं सामने आयीं। कुछ इतिहासकारों ने उन घटनाओं में से 1912-13 के दौरान हुए बाल्कन युद्धों को प्रमुख कारण माना। दरसअल बुल्गारिया स्थित 'बाल्कन' पर्वतों के आसपास के देशों ने स्वयं को 'बाल्कन लीग' घोषित कर दिया था और तुर्की पर आक्रमण कर दिया था जिसके फलस्वरूप प्रथम बाल्कन युद्ध हुआ। 1913 में हुए द्वितीय बाल्कन युद्ध के उपरांत 1914 में आर्कड्यूक फ्रांज़ फर्डीनांड की हत्या हुई और प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हो गया। भयंकर विनाश और त्रासदी के बाद युद्ध का सारा दोष जर्मनी के मत्थे मढ़ दिया गया और द्वितीय विश्व युद्ध की पटकथा भी लिख दी गयी। द्वितीय विश्व युद्ध तक किसी भी देश पर सबसे बड़ा खतरा बाह्य आक्रमण को ही माना जाता था इसलिए हर देश अपनी सशस्त्र सेनाओं (जल-थल-नभ) को शक्तिशाली बनाने पर ज़ोर देता था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व में दो महाशक्तियों का उदय हुआ- संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ (रूस)। शक्ति सन्तुलन की इस जंग में रूसियों ने कम्युनिस्ट विचारधारा से लैस आतंकवादी गुप्त रूप से अमरीका में भेजने शुरू किये। तब अमरीका की एजेंसियों ने बोल्शेविकों को राष्ट्रीय सांस्कृतिक परिवेश के विरुद्ध कार्य करने वाला माना और उनका निर्ममता से दमन किया। इस तरह एक नया विचार उभर कर आया जिसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा' कहा जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ है किसी भी राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक, खाद्य, सांस्कृतिक एवं सीमाओं की सामूहिक सुरक्षा। राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा प्रगति में योगदान देने वाले हर कारक की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा कहलाती है चाहे वह शिक्षा हो या राजनीतिक व्यवस्था। इनमें से किसी भी कारक पर खतरा हो तो उसे राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा माना जायेगा।

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप कई छोटे-छोटे राष्ट्रों में विभाजित हो गया था। चूंकि ये सब बाल्कन पर्वतीय देशों के बीच झगड़े से प्रारंभ हुआ था अतः किसी भौगोलिक क्षेत्र का कई राष्ट्रीय अस्मिताओं में बंट जाना 'Balkanization' कहलाता है। जैसा कि आज हम पाकिस्तान के सन्दर्भ में देखते हैं कि बलोचिस्तान सिंध सभी इस्लामाबाद-रावलपिंडी के नियंत्रण से मुक्त होना चाहते हैं। यूरोप और अमरीका के चिंतन में एक विशेषता है कि वे इतिहास से सीखना जानते हैं। अपनी सत्ता का प्रभाव दूसरे देशों पर कायम रखने के लिए इन्होंने कई रणनीतियाँ अपनाईं जो प्रत्यक्ष युद्ध से भिन्न हैं। जैसा कि जनरल क्लॉज़्विट्ज़ ने 'On War' में लिखा है कि "War is the continuation of politics by other means." अर्थात् युद्ध भिन्न माध्यमों से राजनीति का विस्तार है। वैश्विक राजनीति में दबदबा रखने के लिए यूरोप-अमरीका युद्ध के कई परोक्ष तरीके अपनाते हैं। कभी जलवायु परिवर्तन का मुद्दा उठा कर तो कभी आर्थिक प्रतिबंध लगा कर। इन्हीं तरीकों में से एक है ईसाईयत का प्रचार व प्रसार जो भारत में ब्रिटेन से आये मिशनरी कई वर्षों से करते रहे हैं। ब्रिटिश शासन के आरंभ में अधिकारी क्रिकेट की टीमों का नामकरण 'हिन्दू टीम', 'पारसी टीम' इस तरह किया करते थे और हिन्दू मुसलमान इन दोनों को भिन्न समुदाय नहीं बल्कि 'Nationalities' अर्थात् दो अलग राष्ट्रीय अस्मिताएं कहा करते थे। भारत खण्ड के Balkanization में अंग्रेजों ने महती भूमिका निभाई और पाकिस्तान बनाने में सफलता पाई।

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जब कम्युनिस्ट रूस का खतरा नहीं रहा तब अमरीका के स्टेट डिपार्टमेंट यानि विदेश मंत्रालय ने एक शोध पत्र प्रकाशित किया। उसमें एक विचित्र प्रकार की चिंता प्रकट की गयी थी। उस दस्तावेज में लिखा गया था कि दक्षिण एशिया में स्थित भारतीय उपमहाद्वीप का समाज अपने मौलिक स्वरूप में सांस्कृतिक रूप से एक है। हिन्दू दर्शन से निकले विभिन्न मत सम्प्रदाय अफगानिस्तान में बामियान की बौद्ध मूर्तियों से लेकर कम्बोडिया में रामायण के मंचन तक फैले हुए हैं। यदि भविष्य में कभी ये सभी सांस्कृतिक समुदाय एक हो गए तो अत्यधिक शक्तिशाली हो जाएंगे जिससे अमरीका के सामरिक तथा भूराजनैतिक हितों पर आँच आना लाजमी हो जायेगा। मूल रूप से यह विचार रूसी चिंतक एंटोनियो ग्रामस्की का है जिसे Cultural Hegemony कहा जाता है जिसका अर्थ है किसी विशेष सांस्कृतिक समुदाय का दूसरे समुदाय के लोगों पर एकाधिकार स्थापित हो जाना। ऐसा दक्षिण एशिया में न हो इसीलिए यूरोप और अमरीका अपने ईसाई मिशनरियों को भारत में भेजकर 'faultlines' तलाशते हैं। समाज में उन्हें जहाँ भी आर्थिक असमानता की थोड़ी बहुत दरार भी दिखाई देती है वहाँ प्रहार करने से ये नहीं चूकते। हमारे शूद्र (कार्यकुशीलव) भाई बहनों को भड़का कर कथित ब्राह्मणवाद का डर दिखा कर उनका मतांतरण करते हैं। इस प्रकार एक हिन्दू शूद्र के गले में क्रॉस लटकाकर भारत की सामाजिक सांस्कृतिक एकता को क्षति पहुँचाकर ये भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को भेदने का कुत्सित प्रयास करते हैं। भारत का Balkanization इनका अंतिम मिशन है। यही काम एक समय में कम्युनिस्ट प्रचारक अमरीका में किया करते थे। अंतर यही है कि उनका तरीका थोड़ा हिंसक हुआ करता था तथा मत नहीं अपितु एक खास विचारधारा से प्रेरित था इसलिए बोल्शेविकों को पकड़ना आसान था। आज स्थिति यह है कि 'एवांजलिस्ट' मत प्रचारक अमरीकी प्रशासन में इतनी पैठ रखते हैं कि उन्होंने 1998 में The International Religious Freedom Act पास करवाया जिसके अनुसार यदि अमरीका को लगता है कि कोई देश अपने यहाँ किसी एक पंथिक समुदाय को प्राथमिकता दे रहा है या प्रोत्साहित कर रहा है तो उस पर पंथनिरपेक्षता को खतरा बताते हुए आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे।

भारतीय प्रबुद्ध समाज को ईसाईयत के खतरों के बारे में कुछ बातें स्पष्ट रूप से समझनी चाहिये। जो भी अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला सेंट मैरी, जॉन अथवा जोसेफ नामक कॉन्वेंट स्कूलों में करवाते हैं वे इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ हैं कि अनजाने में वे अपनी गाढ़ी कमाई ईसाई मिशनरियों को दे रहे हैं। वे इस पर विचार करें कि कोई स्कूल अपना नाम महर्षि भारद्वाज, चरक या भास्कराचार्य के नाम पर क्यों नहीं रखता जबकि ये विद्वान तो वैज्ञानिक हुआ करते थे। ईसाई मत में तो चमत्कार देख कर सन्त की उपाधि दी जाती है। कुछ ICSE बोर्ड के स्कूल संस्कृत को अंग्रेजी में पढ़ाते हैं ताकि बच्चों में संस्कृत साहित्य के प्रति रुचि उत्पन्न ही न हो। भारत में अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता को जन्म देने वाले सईद नक़वी साहब आज भले ही यह कहते हों कि भारत का मुसलमान खतरे में है लेकिन एक इंटरव्यू में उन्होंने यह स्वीकार किया है कि भारत की एकता को अक्षुण्ण रखने में साड़ी के साथ संस्कृत का भी महत्व है। इस पर विचार करें क्योंकि संस्कृत वह भाषा है जो पूजा पाठ के साथ उत्तर भारत से दक्षिण तक चली जाती है। राजीव मल्होत्रा ने Battle for Sanskrit में लिखा है कि बाबा साहेब अम्बेडकर ने संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा बनाने पर ज़ोर दिया था। वामपंथी इतिहासकारों पर तो हंसी आती है जब वे लिखते हैं कि भारत में शूद्रों पर ब्राह्मणों ने बड़ा अत्याचार किया। परन्तु वे यह तथ्य गोल कर जाते हैं कि हजार साल राज तो मुसलमानों ने किया। और मुसलमान शासकों ने हिन्दू कट्टरपंथियों को मनमानी करने तो नहीं ही दिया होगा। तब ब्राह्मण अत्याचारी कैसे हो गया?

अमरीका के विश्वविद्यालयों में बैठे कथित 'इंडोलॉजिस्ट' प्रोफेसर लिखते हैं कि चाणक्य के समय भारत में "Brahmanism" नामक रिलिजन था। वर्तनी पर ध्यान दीजियेगा Brahminism और Brahmanism में केवल 'i' और 'a' का फर्क है। Brahmanism को ये सब पूर्व वैदिक काल का रिलिजन कहते हैं उसको 'ब्रह्म' से जोड़ते हैं और लिखते 'ब्रह्मन्' हैं। बाद में Brahminism को ये ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण जाति से जोड़ते हैं। वस्तुतः ये फर्ज़ी इतिहासकार और इंडोलॉजिस्ट ब्रह्म, ब्रह्मा, ब्रह्मन्, ब्राह्मण किसी भी शब्द का सही अर्थ नहीं जानते वरना i और a के अंतर से जाति को रिलिजन नहीं बनाते। भारत विखण्डन शक्तियों का ये सब प्रोपेगैंडा हमारी सांस्कृतिक एकता को चुनौती देता है। वेंडी डोनिगर और शेल्डन पॉलक जैसे प्रोफेसर इस षड्यंत्र में अहर्निश लगे हैं कि किसी भी तरह भारतीयों का संस्कृत से मोहभंग किया जाये। कई साल पहले एक ईसाई मत प्रचारक तरुण विजय से एनडीटीवी पर इस पर बहस कर रहा था कि गीता में कहा गया है कि सभी धर्मों को छोड़ कर मेरे पास आओ। इसका अर्थ उसने यह निकाला कि हिंदुओं के भगवान यह कहते हैं कि अपना मत परिवर्तन करा लो। कुछ सप्ताह पहले हमारे एक मित्र अमरीका से आये थे उन्होंने एक किस्सा सुनाया कि वहाँ उन्हें एक ट्रक ड्राईवर ने गीता भेंट की और कहा कि यदि आप हिन्दू न होते तो शायद इसे लेने से मना कर देते। अमेरिका के उस ट्रक ड्राईवर ने अपना मतांतरण नहीं करवाया था बल्कि स्वेच्छा से गीता की ओर आकृष्ट हुआ था। हाल ही में हेनरी किसिंजर ने अपनी किताब World Order में गीता से प्रभावित होकर नैतिकता और शक्ति के बीच सम्बंध को दर्शाने के लिए उद्धृत किया है।

आज क्रिसमस का त्योहार है। लेकिन दुःख इस बात का है कि हम हिन्दू ईसाई मिशनरियों की चालों को न समझते हुए स्कूल कॉलेज में क्रिसमस कैरोल गाते गाते कई शहरों के गिरजाघरों के आसपास चाट पकौड़ी खाने पहुँच जाते हैं। हमारे इसी उत्सव मनाने के स्वभाव का फायदा ईसाई मिशनरी उठाते हैं। गाँव के भोले भाले लोगों से जादू टोने के ज़रिये ईसाईयत का प्रचार करने को कहते हैं। आज भारत के दक्षिणी भूभाग के कई हिस्से और पूर्वोत्तर राज्य अपनी मौलिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से कट गए हैं। आप क्रिसमस मनाइये लेकिन साथ ही अपने शूद्र और मतांतरित भाई बहनों को genesis और ऋग्वेद की ऋचाओं में अंतर भी बताइये। हिंडोल सेनगुप्ता ने लिखा है कि जेनेसिस के अनुसार ईश्वर ने कहा और धरती आसमान सूरज चांद सब बन गया। यहाँ प्रश्न की गुंजाइश ही नहीं है। जबकि ऋग्वेद 10.129 में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति पर ही प्रश्न किया गया है। हिन्दू धर्म है रिलिजन नहीं। हिन्दू प्रश्न कर सकता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आप राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सजग हैं? क्या आप भारत का Balkanization होने देंगे?

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

नहरु और उनके सिरफिरे नेता हीँ जिम्मेदार थे भारत चीन युद्ध के लिये

नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे । वे चीन को खुश करने के लिए
कई तरह के उपाय कर रहे थे । नेहरू ने 1953 में अमेरिका की उस पेशकश को ठुकरा
दिया था, जिसमें भारत से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने
को कहा गया था । इसकी जगह नेहरू ने चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की
सलाह दे डाली थी । अगर नेहरू ने उस पेशकश को स्वीकार कर लिया होता तो कई दशकों
पहले भारत सामरिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद मजबूत देश के तौर पर उभर
चुका होता । आज भारत को सुरक्षा परिसद मेँ स्थायी सदस्यता के लिये कभी अमेरिका तो कभी G समूह राष्ट्र तथा युरोपियन राष्ट्रोँ को मनवाना पड़रहा है और यह अत्यन्त दूर्भाग्यपूर्ण है । हालांकि
नेहरू चीन की शातिराना चालों को पढ़ने में नाकाम रहे । उनके ज्यादातर मंत्री अयोग्य थे और इस बात को बिके मेनन जैसे रक्षामंत्री के भारतीय शस्त्रागारोँ को बंदकरने ,भारत चीन सीमा सेना वापस लाने जैसी आदेश देने से प्रमाणित होता है । चीन के साथ विवादों को
सुलझाने के लिए भले नेहरुने 'पंचशील' समझौते के तहत तिब्बत पर चीन के हक को
मंजूरी भी दी थी पर नेहरू का चीन पर भरोसा भारत पर बहुत भारी पड़ा । 1962
में चीन ने भारत पर हमला बोल दिया । आज़ादी के बाद भारत आज तक सिर्फ एक लड़ाई
हारा है । यह वही जंग थी, जिसमें भारत को नीचा देखना पड़ा। नेहरू का हिंदी चीनी
भाई-भाई का नारा किसी काम न आया और चीन के साथ जंग में बड़ी संख्या में भारत
ने अपने वीर सपूत खोए । कितने हि माताओँ बहनोँ ने नापाप्रदेश मेँ अपना इज्जत गबाया । आखिर मेँ शेषभारत के नारीओँ ने जब देखा भारत हार रहा है ,उन्होने अपने अभूषणोँ को सरकार को दान दिया ताकी उस सोने के बदोलौत भार गोलावारुद खरिद सके । भारत के पलटवार से चीन को समझ आया कि भारतीय झुकनेवाले नहीँ है वो आखरी दमतक लढ़ेगेँ । तब अंतराष्ट्रिय दवाब के आगे झुककर चीन नेँ युद्ध खत्म कि घोषणा यह करते हुए कि की तिबत्त और बाकी जीतेगये हिस्से पर अब उसका कब्जा है और भारत के इस कमजोर प्रधानमंत्री ने वजाय लढ़ने के इसे स्विकार कर लिया तब जब हमारे सैनिक जीत रहे थे । 1954 से चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने
तिब्बत में अपने विस्तार का जो सिलसिला शुरू किया, वह आज भी जारी है । दुनिया की छत कहे जाने वाले तिब्बत में चीन के खिलाफ आंदोलन आज भी चल रहा है।
तिब्बत में चीन के पांव पसारने का नतीजा यह हुआ है कि आज उसके हौसले बुलंद हैं
और वह न सिर्फ गाहे ब गाहे वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन कर रहा है बल्कि
अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा बताता है। नेहरू की वह गलती आज
भारत पर बहुत भारी पड़ रही है और भारत को चाहिये की वो चीन जैसे दोगले देशोँ को उन्ही के अंदाज मेँ जवाब देँ तब इनके अक्ल ठिकाने आयेगी ।

वंदेमातरम् पर मुस्लिम लीग नेँ किया था पहला आंतरिक हमला

वंकिम चंद्र चेटर्जी कि ऐतिहासिक नवलकथा आनन्दमठ से लिया गया प्रसिद्ध बंदे मातरम गीत भारतीयोँ के लिये केवल मात्र एक गीत नहीँ है अपितु मातृभुमि की प्रेम मेँ स्वयं को ओतप्रोत कर लेनेवाली शक्ति है । बंदे मातरम से प्रेरित होकर ओडिआओँ ने बंदे उत्कल जननी नामक गीत की रचना की और यह भी ओड़िशा राज्य मेँ काफी मशहुर हुआ था । परंतु व्रिटिस राज को वंदेमातरम शब्द से नफरत था और इसलिये 1905 मेँ पूर्व बंगाल के लेफ्टनेँट गवर्नर नेँ एक आदेश जाहिर करते हुए कहा था कि बंदे मातरम कोई उच्चारण न करे ऐसा करना अपराध है । परंतु प्रथम वक्त इस राष्ट्रगीत पर आँतरिक प्रहार 1923 मेँ कंग्रेस का काकीनाडा अधिवेशन मेँ हुआ । सुप्रसिद्ध गायक विष्णु दिगंवर पलुस्कर कंग्रेस के उद्घाटन अधिवेशन मेँ बंदे मातरम गीत गाने के लिये मंच पर जाने लगे तो उनको अधिवेशन अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अलीनेँ रोक कर कहा कि इस्लाम मेँ संगीत बर्जित है इसलिये वो यहाँ गीत गाने के लिये अनुमति नहीँ देगेँ । समग्र सभा स्तभ्ध हो गया पर पलुस्कर टस् से मस् न हुए ,मौलाना को उन्होने कडक शब्दोँ
मेँ कहा कि भारतीय जातीय कंग्रेस पर किसी संप्रदाय विशेष का जागिर नहीँ चलता । ये स्थान कोई मसजिद भी नहीँ है कि कोई मुझे इस गीत को गाने के लिये रोक सकता है और न ही आपके पास ऐसा अधिकार है कि आप मुझपर धौँस जमाये । गीत गाया गया और उसी दिन से पाकिस्तान का विजरोपण हो गया । ये मौलाना मोहम्मद अली खिलाफत आंदोलन के अग्रज नेता थे और मुस्लिम लीग बनानेवाली विचारधारा के जनक भी । इस घटना के बाद अग्रेँजोँ को मुस्लिम लीग को अपने तरफ करने का मौका मिलगया और लीग को आर्थिक सहायता करनेवाला सत्ता । अब कंग्रेस के लिये बंदे मातरम रास्ते का काँटा बनचुका था क्युँकि मुसलमानोँ को अपने साथ करना था । जो कंग्रेस अंग्रेजोँ के लाठी गोली से कत्लेआम से नहीँ डरी थी उसके पाँव लीग के सामने बंदेमातरम को लेकर डगमगाने लगी । आखिरकार कंग्रेस लीग के आगे झुकगया और मुसलमानोँ को राजी करने के लिये उसे "सारे जहाँ से अछा हिन्दोस्तान हमारा" राष्ट्रिय गीत बनाना पड़ा । पाकिस्तान के जनक महम्मद इकवाल नेँ यह गीत लिखा था । पाकिस्तान बनने पर इन्होने एक और गीत लिखा था "मुस्लिम है हम वतन है सारा जहाँ हमारा " । 1937 मेँ कंग्रेस प्रान्तिय विधानसभा चुनाव मेँ विजयी हुआ और परंपरा के अनुसार कामकाज कि शुरुवात वंदेमातरम् कि जयनाद के साथ शुरु हुआ । अब लीग के सभ्योँ को यह बात खटक गई और उन्होने इसे मुद्दा बनाकर हंगामा पर उतर आये । लीगवाले कंग्रेस शासित राज्योँ को हिन्दुराज्य कहने लगे जैसे आज बिजेपी के साथ हो रहा है । लीग नेँ अपने कार्यकर्ताओँ के लिये फरमान जाहिर किया कि कोई भी सदस्य इस बंदेमातरम् गीत से कोई सबंध न रखे । अब कंग्रेस को डर सताने लगा जो अबतक कायम है कि अंग्रेज हिन्दु मुस्लिम एकता के बीना भारत को सत्ता न सौँपे तो ?
तो कंग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिये बंदेमातरम् को राष्ट्रगान कि पदवी से हटाकर अन्य गीतोँ के श्रेशीओँ मेँ ला खड़ा किया और बंदेमातरम् कविता से केवल पहले चार पंक्तिओँ का गाया जाय लोगोँ से इसतरह कि अनुरोध किया गया । बर्तमान भारत मेँ कंग्रेस मुस्लिम लीग का रोल निभा रहा है और बिजेपी पराधीन भारत कि उस वेवश कंग्रेस कि तरह बर्ताप करने लगा है । समय आ गया है कि हम भारतीय हिन्दुओँ को अपने सभ्यता संसकृति को बचाने के लिये बड़े कदम उठाने होगेँ अरबी संस्कृति प्रेमीओँ को गर भारतीय संस्कृति सभ्यता से दिक्कतेँ आ रही है तो वे अरब चले जाय अथवा पाकिस्तान या बंगलादेश । नागफनी का वर्षावन मेँ जीवन व्यतित करना आसान कहाँ है ???

भारत मेँ 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ था या सिपाही विद्रोह ?

29 मार्च 1857 को भारतीयोँ ने पहलीवार अंग्रेजोँ के खिलाफ विद्रोह किया और 1 मई तक चला था ।
मंगल पांडे ने बैरकपुर के परेड ग्राउंड में गोली चलाने से इनकार कर इसकी शुरवात की थी ।
29 मार्च को बैरकपुर में ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज अफसर पर पहली गोली मंगल पांडे ने चलाई और बाकी सिपाहियों को भी ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला बोलने को कहा । अंग्रेजी सेना ने मंगल पांडे को गिरफ्तार कर लिया और बाद में मुकदमा चलाकर फांसी दे दी । उस समय सेना में लाए गए नए एनफील्ड राइफल और कारतूस को लेकर सिपाही मंगल पांडे ने विरोध जताया था ।
माना जा रहा था कि उन कारतूसों को बनाने में गाय और सूअर की चर्म या वसा का इस्तेमाल किया गया था । ये दोनों ही चीजें हिंदू और मुसलमानों दोनों के लिए अपवित्र मानी जाती हैं । इस विरोध ने पूरे उत्तर भारत में विद्रोह की एक लहर चला दी थी । भारत में इसे आजादी की पहली लड़ाई कहा गया लेकिन ब्रिटिश शासन ने उसे सिपाही विद्रोह का नाम दिया ।
कोलकाता के बाहरी क्षेत्र के बैरकपुर में अंग्रेजी शासन ने 1765 में अपनी पहली छावनी बनाई थी । उसी बैरकपुर परेड ग्राउंड में 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी पर लटका दिया गया । उनके विद्रोह ने मेरठ से दिल्ली तक विरोध की लहर चला दी थी । आजादी का पहला संग्राम विफल रहा लेकिन इस विद्रोह का असर बहुत व्यापक रहा । सामूहिक नेतृत्व के अभाव के कारण विद्रोह को कुचला भी जा सका । इतिहासकार मानते हैं कि 1857 के विद्रोह ने ही आजादी की लड़ाई की मजबूत नींव रखी थी और अगर यह विद्रोह कुछ वर्ष पूर्व हुआ होता तो शायद अंग्रेज भारत मेँ टिक नहीँ पाते । 1857 तक संचार एबं परिवहन क्षेत्र मेँ काफी उन्नति हुई थी यही कारण है कि अंग्रेज विद्रोह कुचलने मेँ सफल हुए । साधारण जनतानेँ भी इस विद्रोह मेँ सिपाहीऔँ का साथ नहीँ दिया था उस समय भारतीय समाज या तो शोया हुआ था अथवा उसे यकिन न था की उन्हे अंग्रेजोँ से युँ मुक्ति मिलजायेगी । भले अंग्रेजोँ ने इसे सिपाही विद्रोह कहा पर
भारतीय बुद्धिजीवि आज भी इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानते है । हालाँकि एक लम्बे समयकाल तक भारतीय स्कुलोँ के पाठ्यपुस्तकोँ मेँ इसे सिपाही विद्रोह के रुप मेँ ही पढ़ाया गया । एक तरह से कंग्रेस द्वारा इस सशस्त्र आदोँलन को गांधी की अंहिसा आंदोलन से कम महत्व देने के लिये हर संभव प्रयाश किया गया था ।

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

जगन्नाथ और 165 साल का अग्यांतवास

(1568 से 1733 AD ) 165 साल तक के समयकाल मेँ पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर पर कईवार अफगानी,मुसलमान और मोगल शासकोँ ने हमला किया । हिँदुओँ कि धार्मिक भावनाओँ को ध्वंस्त विध्वंस्त करदेने के लिये मुसलमान शासकोँ नेँ जी तोड़ कोशिश की । रक्तवाहु से कलापाहाड़ , कल्यानमल्ल से तकि खाँ तक जितने भी आक्रमणकारी आये हिँदुओँ के आराध्य देवता श्री जगन्नाथ जी को जीत न लेने तक ओड़िशा को जीतना असंभव और व्यर्थ प्रयास होगा ये समझगये थे । हमलावर आये हार कर चलेगये उन्हे सिर्फ हार और नैराश्य हात लगा । इन यवन आक्रमणकारीओँ से श्रीविग्रह रक्षा हेतु दो वृत्तिभोगी सेवक जाति को नियुक्ति किया गया । इनके वंशज अभी भी पुरी मेँ निवाश करते हे (CHAPA DALEI , AARATA DALEI ) जब कभी आक्रमण की सुचना मिली तिनोँ श्रीविग्रह को अग्यांत स्तान पर स्तानांतरण कर लिया जाता ।

सर्वप्रथम आक्रमण 1568 मेँ रक्तवाहु ने किया था ये एक अफगानी हमलावर जिसने पुरी मेँ तवाही मचाया था । उस समय श्रीविग्रह सोनपुर ले जाकर अग्यांतवास मेँ रखा गया था ।

1607 मेँ हमला हुआ तो श्रीविग्रह कपिलेश्वर मंदिर (पुरी मेँ स्तित एक मंदिर) अग्यांतवास मेँ रखागया था !


1610 मेँ केशु दास नाम से एक मोगल सुवेदार ने श्रीमंदिर मेँ आक्रमण किया था और तिनोँ रथ को आग लगा दिया था ।

जब 1615 साल मेँ तोदरमल्ल का पुत्र कल्यान्मल्ल नेँ पुर्नवार श्रीमंदिर पर हभला किया श्रीविग्रह को ले जाकर चिलिका (LAKE) ह्रद मेँ गुरुवरदाई नामक स्थान पर रखागया था ।

1622 मेँ सुवेदार अहमन् वेग नेँ जब पुरी कुच किया तो भगवान भाई वहन वीरोँ के भुमि माणित्री गड़ अग्यांतवास विताने आये ..!

1624 मेँ फिर हमला हुआ तब श्रीविग्रह साक्षिगोपाल नामके स्थान पर छुपाकर रखागया ।

1647 और 1698 मेँ भयकंर युद्ध हुआ था और मोगल शक्ति को परास्त होना पड़ा था ।

1733 तकि खाँ कटक को नाएव निजाम होकर आया तब सार ओड़िशा मेँ एक अनजाना भय मेँ लोग ड़र रहे थे । 1733 मेँ तकि खाँ नेँ आखरीवार जगन्नाथ पुरी पर हमला किया तब श्रीविग्रह को गंजाम जिल्ला के आठगड़ मेँ स्थित मारदा (Sarana rakhyana marada)नामक स्थान पर तिन साल तक छुपाकर रखा गया था । इसके अलावा वाणपुर नयागड और ढ़ेकांनाल मेँ भी श्रीविग्रह को अग्यातंवास मेँ रखा गया था । ओड़िआओँ नेँ मुसलमानोँ के आगे घुटने नहीँ टेके वो हमारे बहू बेटियोँ के उपर अत्याचार किया हमारे कई मंदिर तोड़े हमारे रथ जलादिया पर