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सोमवार, 17 जुलाई 2017

जब देना पड़ा था श्रीरामजीको भी धर्म परिक्षा


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श्रीराम का वनवास ख़त्म हो चुका था.
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एक बार श्रीराम ब्राम्हणों को भोजन करा रहे थे तभी भगवान शिव ब्राम्हण वेश में वहाँ आये.
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श्रीराम ने लक्ष्मण और हनुमान सहित उनका स्वागत किया और उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया. भगवान शिव भोजन करने बैठे किन्तु उनकी क्षुधा को कौन बुझा सकता था ?
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बात हीं बात में श्रीराम का सारा भण्डार खाली हो गया. लक्ष्मण और हनुमान ये देख कर चिंतित हो गए और आश्चर्य से भर गए. एक ब्राम्हण उनके द्वार से भूखे पेट लौट जाये ये तो बड़े अपमान की बात थी
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उन्होंने श्रीराम से और भोजन बनवाने की आज्ञा मांगी. श्रीराम तो सब कुछ जानते हीं थे, उन्होंने मुस्कुराते हुए लक्ष्मण से देवी सीता को बुला लाने के लिए कहा.
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सीता जी वहाँ आयी और ब्राम्हण वेश में बैठे भगवान शिव का अभिवादन किया. श्रीराम ने मुस्कुराते हुए सीता जी को सारी बातें बताई और उन्हें इस परिस्थिति का समाधान करने को कहा.
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सीता जी अब स्वयं महादेव को भोजन कराने को उद्धत हुई. उनके हाथ का पहला ग्रास खाते हीं भगवान शिव संतुष्ट हो गए.
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भोजन के उपरान्त भगवान शिव ने श्रीराम से कहा कि आकण्ठ भोजन करने के कारण वे स्वयं उठने में असमर्थ हैं इसी कारण कोई उन्हें उठा कर शैय्या पर सुला दे.
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श्रीराम की आज्ञा से हनुमान महादेव को उठाने लगे मगर आश्चर्य, एक विशाल पर्वत को बात हीं बात में उखाड़ देने वाले हनुमान, जिनके बल का कोई पार हीं नहीं था, महादेव को हिला तक नहीं सके. भला रुद्रावतार रूद्र की शक्ति से कैसे पार पा सकते थे ? हनुमान लज्जित हो पीछे हट गए.
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फिर श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण ये कार्य करने को आये. अब तक वो ये समझ चुके थे कि ये कोई साधारण ब्राम्हण नहीं हैं. अनंत की शक्ति भी अनंत हीं थी. परमपिता ब्रम्हा, नारायण और महादेव का स्मरण करते हुए लक्ष्मण ने उन्हें उठा कर शैय्या पर लिटा दिया.
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लेटने के बाद भगवान शिव ने श्रीराम से सेवा करने को कहा. स्वयं श्रीराम लक्ष्मण और हनुमान के साथ भगवान शिव की पाद सेवा करने लगे.
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देवी सीता ने महादेव को पीने के लिए जल दिया. महादेव ने आधा जल पिया और बांकी जल का कुल्ला देवी सीता पर कर दिया.
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देवी सीता ने हाथ जोड़ कर कहा कि हे ब्राम्हणदेव, आपने अपने जूठन से मुझे पवित्र कर दिया. ऐसा सौभाग्य तो बिरलों को प्राप्त होता है.
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ये कहते हुए देवी सीता उनके चरण स्पर्श करने बढ़ी, तभी महादेव उपने असली स्वरुप में आ गए. महाकाल के दर्शन होते हीं सभी ने करबद्ध हो उन्हें नमन किया.
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भगवान शिव ने श्रीराम को अपने ह्रदय से लगते हुए कहा कि आप सभी मेरी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए.
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ऐसे कई अवसर थे जब किसी भी मनुष्य को क्रोध आ सकता था किन्तु आपने अपना संयम नहीं खोया. इसी कारण संसार आपको मर्यादा पुरुषोत्तम कहता है.
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उन्होंने श्रीराम को वरदान मांगने को कहा किन्तु श्रीराम ने हाथ जोड़ कर कहा कि आपके आशीर्वाद से मेरे पास सब कुछ है. अगर आप कुछ देना हीं चाहते हैं तो अपने चरणों में सदा की भक्ति का आशीर्वाद दीजिये.
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महादेव ने मुस्कुराते हुए कहा कि आप और मैं कोई अलग नहीं हैं किन्तु फिर भी देवी सीता ने मुझे भोजन करवाया है इसीलिए उन्हें कोई वरदान तो माँगना हीं होगा.
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देवी सीता ने कहा कि हे भगवान, अगर आप हमसे प्रसन्न हैं तो कुछ काल तक आप हमारे राजसभा में कथावाचक बनकर रहें. उसके बाद कुछ काल तक भगवान शिव श्रीराम की सभा में कथा सुना कर सबको कृतार्थ करते रहे।
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

लैंप पोस्ट के नीचे दीनबंधु निराला

~राजेश जोशी~

मैं आज तक किसी महापुरुष से नहीं मिला हूँ लेकिन कई महापुरुषों की कहानियाँ पढ़ी हैं कि कैसे अभावों में उनका जीवन बीता और कैसे लैंपपोस्ट के नीचे बैठकर रात रात को उन्होंने पढ़ाई पूरी की.

दीनबंधु निराला कोई महापुरुष नहीं है. अलबत्ता उसका नाम दो महापुरुषों के नाम से बना है - महात्मा गाँधी के सहयोगी दीनबंधु एण्ड्रूज़ और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला.

वो एक 18 वर्ष का किशोर है जिसे आप किसी शाम पटना के प्रसिद्ध गाँधी मैदान के बीचोंबीच लगे ऊँचे लैपपोस्ट के नीचे गणित के सवालों से जूझते देख सकते हैं.

वहाँ सेना या सुरक्षा बलों में भर्ती होने की तैयारी कर रहे कुछ नौजवान कसरत करने आते हैं.

चने मुरमुरे बेचने वाला एक कमज़ोर वृद्ध ग्राहकों का इंतज़ार करते करते थक कर वहीं धरती पर बैठ गया था. कुछ बेरोज़गार नौजवान निरुद्देश्य टहल रहे थे.

मैदान के चारों ओर सड़कों से मोटर, कार, ट्रक और टैम्पो के हॉर्न की आवाज़ें आ रही थीं.

रह रह कर एक बारात में छोड़े गए पटाख़ों की आवाज़ें भी आसमान में गूँज जाती थीं. इतने शोर शराबे के बीच लैंपपोस्ट के नीचे बने चबूतरे पर दीनबंधु निराला अपनी किताबों पर झुका हुआ गणित के मुश्किल सवाल सुलझाने में लगा था.

मैं उसके बिलकुल पास जाकर बैठ गया और इंतज़ार करता रहा कि किसी तरह बात शुरू हो. लेकिन उसने नज़र उठाकर मेरी ओर नहीं देखा.

शोर के बीच भी वो एक स्वनिर्मित सन्नाटे में समाधिस्थ था ! मैंने देखा गणित के समीकरण उसकी कलम से निकल निकल कर कॉपी पर बिछते जा रहे थे, जिन्हें मैं नहीं समझ पाया.

समीकरण सिद्ध होने के बाद लिखा गया अँग्रेज़ी का सिर्फ़ एक शब्द - प्रूव्ड यानी सिद्ध हुआ - मुझे समझ में आया. आख़िर मैंने ही बातचीत की शुरुआत की.

"क्या बनना चाहते हो?" "मैं मैकेनिकल इंजीनियर बनना चाहता हूँ और अगर ख़ुदा भी आ जाए तो मुझे वो रोक नहीं सकता".

"कहाँ रहते हो? "यहाँ से तीन सौ किलोमीटर दूर सुपोल ज़िले के एक गाँव में." "पिछले साल कितने नंबर आए थे?" "पिछले साल पाँच सौ में से 385 नंबर आए थे.

आइएससी (यानी बारहवीं) का इम्तिहान इस साल देने की तैयारी कर रहा हूँ." उसक आवाज़ में न तो ग़ुरूर का पुट था और न ही किशोर सुलभ कच्चा हौसला.

उसके बयान में आश्वस्ति का भाव था और ठोस आत्मविश्वास था. वो सिर्फ़ परीक्षा की तैयारी के लिए पटना आया है और अपने कुछ दोस्तों के साथ रहता है.

बदले में वो उनके लिए खाना बना देता है और इस बात के लिए वो अपने दोस्तों का बार बार शुक्र अदा करता है. बातचीत में काफ़ी वक़्त गुज़र गया था. अँधेरा कुछ और गहरा हो गया था.

निराला ने अपने बस्ते में किताबें समेटीं और लैंपपोस्ट से दूर अँधेरे में आगे बढ़ गया. उसे अभी बहुत लंबा सफ़र तय करना था. मैं चाहता हूँ कि दीनबंधु निराला मैकेनिकल इंजीनियर न बने.

मैं जानता हूँ कि वो कोई और बड़ा सपना देखने और उसे हासिल करने की कुव्वत रखता है.