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अयनांत काल है - 21 दिसम्बर से 14 जनवरी तक। वाराह प्रतिमायें इस समय से जुड़ी हैं। अवतार की प्रतिमाओं में वाराह के एक दाँत पर उद्धार की गयी पृथ्वी दिखती है और उसके गले पर 27 नक्षत्रों के प्रतीक और पीठ पर आकाशीय पिंड प्रतीक देव उत्कीर्ण होते हैं। ये प्रतिमायें इस तरह बनायी गयीं कि शीत अयनांत के दिन वाराह पर विष्णु स्तम्भ की प्रात:छाया सीधे पड़े। विष्णु स्वरूप वाराह वास्तव में सूर्य ही हैं। धरती का जलमग्न होना वास्तव में दक्षिणायन सूर्य के कारण घटा हुआ प्रकाश ताप है। जल शीतल होता है। शीतलता का सम्बन्ध अवसान से है, सूर्य ऊष्ण होता है, ऊष्मा का सम्बन्ध जीवन से है। देह में जीवन हो तो ऊष्म रहती है। वाराह अवतार जीवन की स्थापना है। वाराह उत्सव वैसे ही होने चाहिये जैसे पश्चिम में अयनांत से जुड़ा क्रिसमस। :) क्या मैं सही कह रहा हूँ?
गुरुवार, 22 दिसंबर 2016
वराह अवतार
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