बुधवार, 21 दिसंबर 2016

टैगोर खानदान कि सच्चाई

जो लोग टैगोर के खानदान के तैमूर  तक पंहुचने की बात करते हैं उन्हें टैगोर खानदान के बारे में भी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए ।1860-70 में बंगाल के पुरुलिया में एक अत्यंत निर्धन  ब्राह्मण परिवार रहता था जिसमे चार भाई थे ।चारों गौर वर्ण के सुन्दर कुछ पढ़े लिखे भी । तब के बिहार बंगाल में भूमिहीन ब्राह्मणों की शादी मुश्किल थी । अंत में इनमे से दो भाइयों ने गाँव की ही एक हरिजन कन्या को बहला फुसला कर उसे अपनी रखैल बना लिया और गांव में विरोध के डर से उसे लेकर चटगांव भाग गए । वहां तब अंग्रेज बहुत बड़ा बंदरगाह बना रहे थे । एक अंग्रेज ने गोरे चिट्टे भाइयों को देखा तो उन्हें अपने काम की देखरेख में रख लिया । धीरे धीरे दोनों वही छोटी मोटी ठिकेदारी करते करते इतने अमीर हो गए कि तब एक अंग्रेज के साथ अपनी शिपिंग कंपनी खड़ी कर ली और कोलकाता में अपनी शानदार कोठी बना ली । इन्ही दोनों भाइयों की साझा संतान हुए द्वारकानाथ ठाकुर या टैगोर ।टैगोर नाम ठाकुर का अंग्रेजों द्वारा अपने तरीके से इन्हें ठाकुर को तोड़ मरोर कर पुकारे जाने के कारन पड़ा । इतने अमीर होने के बाबजूद कोलकाता का ब्राह्मण समाज इनके पुराने इतिहास के कारण इन्हें तुच्छ समझता था और आज भी बंगाल में "पिराली ब्राह्मण" एक गाली मानी जाती है जो इसी परिवार के कारन प्रचलित हुई । पिराली शब्द पुरुलिया से आया है । द्वारकानाथ ठाकुर बहुत खर्चीले रईस थे और तब उनका सालाना खर्च एक लाख सालाना था जब एक रूपए महीने में सामान्य आदमी परिवार चलाता था । इनके पुत्र देवेन्द्र नाथ अपने बाप की अय्याशी से नफरत करते थे और बाद में सन्यस्त हो गए थे । इन्ही देवेन्द्रनाथ के पुत्र कविवर रविंद्रनाथ टैगोर हुए जिनकी पोती शर्मीला ने नबाब पटौदी से शादी कर ली ।
यानी ये खानदान चाहे जो रहा हो इसकी आधारशिला ही अवैध रही है इसलिए आश्चर्य नहीं कि ये गिरते गिरते "तैमूर " तक आ गयी है ।

सभार:-

-Arun Mishra

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