सोमवार, 4 नवंबर 2013

दंगोँ से दुर रहेँ

दो दिन पहले लोगोँ ने बडे धुमधाम से दिपावली मनाया . उस दिन रात को तो दीपोँ के जगमगाहट से अंधेरे को मिटा दिआ परंतु अपने मन अंधकारमय है ये वात भुल वैठे . 1 दिन वाद कई जगहो मेँ सांप्रदायिक हिँसा इस वात का सबुत है . कुछ लोग लगातार Social media का इस्तेमाल दंगेँ फैलाने के लिये कर रहे है जिससे आये दिन सांप्रदायिक हिँसा फलफुल रहा है . दंगे होने पर सबसे बड़ा खतरा औरतोँ पर रहता है और ऐसे अबसर पर अकसर बो दंगोँ के शिकार होती हे . ये बात सत्य है और इतिहास इसे कई वार दोहरा चुका है . हाल भारत मेँ हो रहे भ्रष्टाचार चरम पर हे और ऐसे मेँ मुस्लिम तथा हिँदु संस्थाओँ के बीच आपसी तनाव चुनाव के चलते और भी जटिल होता जा रहा है. कमनम्यान को समझना होगा की उसे जाहाँतक हो सके इन तनाव से दुर रहना है वरना ये देस और आम आदमी दोनोँ ही समा मेँ परवाने की तरह जल जायेगेँ...

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